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न सुनवाई न जांच तो कैसे बाहर आयेगा राफेल का सच?

चुनाव आते ही राफेल का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है

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राफेल का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। पुलवामा हमले और उसके बाद पाकिस्तान के खिलाफ एयर स्ट्राइक के चलते विपक्ष के सारे मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गये थे लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब सरकार के एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि राफेल विमान सौदे से संबंधित कुछ दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गये हैं तो यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया। कोर्ट इस मामले में प्रशांत भूषण, समेत कुछ लोगों द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रहा है।
पहले दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है और जिन नये दस्तावेजों के आधार पर पुनर्विचार याचिका लगाई गई है, वे बकौल सरकार वही दस्तावेज हैं, जिनके चोरी होने की जानकारी अब सरकार दे रही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी है कि ये नये दस्तावेज ऐसे सबूत हैं जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जैसी किसी जांच का आदेश दे सकता है लेकिन एटार्नी जनरल ने बार-बार दलील दी कि चोरी गये दस्तावेजों को सुनवाई का आधार न बनाया जाये। कोर्ट ने पूछा कि इस मामले में एफआईआर क्यों नहीं दर्ज करायी गयी तो एटार्नी जनरल ने कहा कि एफआईआर हुई तो इसमें प्रशांत भूषण, अरूण शौरी और यशवंत सिन्हा के नाम भी आयेंगे। बाद में कोर्ट ने इस बारे में हलफनामा जमा कराने का आदेश देते हुए सुनवाई 14 मार्च तक टाल दी।

पुनर्विचार याचिका पर कोर्ट अंतत: क्या फैसला देगा, यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन कथित रूप से चोरी हुए दस्तावेजों को सुनवाई में शामिल न करने की केन्द्र सरकार की मांग से यह संदेह होना स्वाभाविक है कि दाल में कुछ काला है। एटार्नी जनरल ने पाकिस्तान के साथ जारी तनाव के मद्देनजर राफेल की अनिवार्यता की दुहाई देते हुए सीबीआई जांच का भी विरोध किया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार नये सबूतों को सुनवाई का हिस्सा क्यों नहीं बनने देना चाहती। जहां तक इसके पीछे राफेल की सप्लाई में विलंब का सवाल है, ऐसा नहीं लगता कि कोर्ट ऐसा होने देग लेकिन प्राकृतिक न्याय का यही सिद्धांत है कि पूरा सच बाहर आना चाहिए।

जिन दस्तावेजों के चोरी होने की बात की जा रही है ये वहीं हैं जिनका प्रकाशन अंग्रेजी अखबार `द हिन्दूÓ ने किया है। ये दस्तावेज उसे कैसे मिले और रक्षा मंत्रालय के किन लोगों ने इसे लीक किया, यह जांच का मुद्दा हो सकता है लेकिन नये दस्तावेजों को सुनवाई से अलग रखने की मांग न्यायोचित नहीं लगती। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि केन्द्र सरकार को दस्तावेजों की चोरी की बात छिपाने और राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में इन्हें नजरंदाज करने की अपील पर लताड़ लगायी लेकिन अंतत: सरकार का पक्ष स्वीकार करते हुए यह साफ कर दिया कि सुनवाई उन्हीं सीलबंद दस्तावेजों के आधार पर होगी, जिन्हें सरकार ने शुरू में न्यायालय को उपलब्ध कराया था और न्यायालय ने तब राफेल की खरीदी प्रक्रिया को सही करार देते हुए याचिका खारिज कर दी थी।

अब जब नये दस्तावेजों को कोर्ट संज्ञान में नहीं लेगा तो पुनर्विचार याचिका का हश्र समझा जा सकता है लेकिन `द हिन्दूÓ ने जो कुछ छापा है उससे राफेल की खरीदी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री कार्यालय के अवांछनीय हस्तक्षेप का खुलासा होता है। इनमें बताया गया है कि गारंटी की रकम समेत कुछ मुद्दों पर रक्षा मंत्रालय के सख्त रवैये के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय ने राफेल बनाने वाली दसॉ लिमिटेड को इसमें रियायत दिला दी। बेशक राफेल की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है लेकिन पारदर्शी और भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था का दावा करने वाली मोदी सरकार राफेल पर विस्तृत जांच से क्यों कतरा रही है, यह समझ से परे है।

जब सरकार कहती है कि उसने यूपीए से बेहतर डील की है तो फिर जांच से परहेज क्यों होना चाहिए। भले ही पाकिस्तान की आड़ में जनता के सारे मुद्दे दफन हो जायें पर राफेल जैसे अहम मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना ही एकमात्र विकल्प है।
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