पुस्तक समीक्षा : टेंशन लेके का करबे ( छत्तीसगढ़ी गजल)

पुस्तक – टेंशन लेके का करबे (छत्तीसगढ़ी गजल)
लेखक – चम्पेश्वर गिरि गोस्वामी
प्रकाशक – एच‌.एस‌.आर‌.ए प्रकाशन बैंगलोर
समीक्षक – देव हीरा लहरी
मूल्य – दो सौ रूपिया

जिनगी के आपाधापी म सबो मनखे करा कहु न कहु ले परेशानी समस्या आते रहिथे, फेर सिरतो बात आय ‘टेंशन लेके का करबे’ सुख-दुख तो आही जाही जिनगी के गाड़ी चलते रही आखरी सांस तक। ये सब ल सोच के हमन का कर लेबो तेकर ले टेंशन न‌ई लेना हे, इही विसय ल लेके कवि लेखक गीतकार चम्पेश्वर गिरि गोस्वामी के पुस्तक ‘टेंशन लेके का करबे’ छत्तीसगढ़ी गजल के प्रकाशन होय हे। येमे 73 अलग-अलग शीर्षक म गजल शामिल हे, जेन निमगा छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखाय हे। जेमे रोवासी होगे जी, आदत बना लन, अपन डहर, मोर भारत के भुईयां, नदिया ल पार कर, बनिहार , समझ ले कका, हटके रहिबे मुख्य रूप ले शामिल हे।

तरीघाट पाटन दुर्ग के लईका चम्पेश्वर गोस्वामी के जनम बोरिया खुर्द रायपुर में 10 फरवरी 1981 के होईस हे ,गीतकार चम्पेश्वर गोस्वामी ला एम ए, बीएड के पढ़ाई संग मानद उपाधि भी मिले हे, गोठ के गाड़ी, गीत के गाड़ी, चंदन अस मोर गांव के माटी पुस्तक के अलावा यमराज के नियाव, सहर के बेटी गांव के बहु, बंटवारा नाव ले नाटक घलो लिखे हे। आप मन जय जोहार टीवी यूट्यूब म जोहार सितारा,जोहार पहुना कार्यक्रम म नवा जुन्ना कलाकार मन ले परिचय करवाथव। टेंशन लेके का करबे पुस्तक म जिनगी ल चिंता फिकर ले न‌ई जिये के बात करे हे, परेशान होय ले कुछु न‌ई होय हमरे स्वास्थ्य खराब होथे, गजल के माध्यम ले सुग्घर ढंग ले टेंशन न‌ई लेके आगु बढ़े बर बताय हे।

जिनगी म कुछ नवा अऊ बने सिखे के बढ़िया माध्यम पुस्तक होथे, छत्तीसगढ़ी भासा म लिखे छपे साहित्य म गुरतुर मिठास होथे, इही मन हमर साहित्य ल संजोए रखे हे। टेंशन लेके का करबे पुस्तक 2023 म पहली संस्करन के रूप म कुल 80 पेज म बने हे, जेकर सहयोग राशि दु सौ रूपया हवय, येला आपमन पुस्तक दुकान न‌इते अमेजन फ्लिपकार्ट म आनलाइन बिसा सकत हव। छत्तीसगढ़ी भासा ल महत्व देवत लेखक गीतकार चम्पेश्वर गोस्वामी के लगभग तीन हजार ले जादा कविता मन टीवी रेडियो यूट्यूब पत्र पत्रिका स्तंभकार फिलिम समीक्षा कथा पटकथा संवाद रूपांतरन के रूप म प्रसारित अऊ प्रकाशित होय हे।

पुस्तक म छपे कुछ छत्तीसगढ़ी गजल –

रात कुन के भात बिहनिया बासी होगे जी
कुटहा मन बर गारी ह घलो सबासी होगे जी

पिछू म मोर तै जतके रहिबे, त परेशान ओतके रहिबे
अंतस के सुख पाबे जादा, मन के बैर बिसरके रहिबे।

गोठ बात के गठरी खोल, बेटा सोच समझ के बोल
उल्टा हो जथे कभु कभु, सीधा झन कोनो ल छोल।

दुनिया भर ले सुग्घर मोर इही गांव हे
तरिया हे धान हे अऊ पीपर के छांव हे
माटी के ममता हे मया हे आकास हे
कोयली के कुहु कुहु कहूं कौवा कांव कांव हे।

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