धमतरी @ विश्वनाथ गुप्ता…. क्या जिले में अपराधियो को सजा मिल पाना संभव है जब गवाह ही अवेजी वाले है जिले का ऐसा कोई थाना नही है जहां गवाह सिर्फ इत्तेफाक वाले गवाह है जो इत्तेफाक से घटना वाली ही जगह में पाए जाते है और ऐसा कोई जुर्म नहीं है जिले में जो इनके सामने नही घटता हो या फिर जिसने घटना की हो उसी के हमराह होते है गवाह जिसे घटना तो क्या खुद के घर का पता सही ढंग से मालूम नही होता और कई गवाह तो ऐसे है जो जवानी से गवाही दे रहे है और अब उम्र बीत जाने के बाद भी गवाही देने का ही रोजगार करते है .
इसका कारण पुलिस व्यवस्था की कमजोरी नहीं गवाहों का समय पर न मिलना है क्योंकि जुर्म कही भी ही पकड़े कोई भी चाहे सायबर या स्पेशल या फिर थाने की टीम कार्यवाई की माथा पच्ची विवेचक को करनी है जिसे सब कुछ परोसा हुआ दिखता है पर होता नही है अब उसे सबसे बड़ी टेंशन गवाही जुगाड़ने की है अगर सब ठीक रहा तो गवाही अपराधी के हमराह ही बन जाते है या फिर वही चक्कर गवाही जुगाड़ों और फिर आता है नंबर अवेज़ी के गवाह की जिसे गवाही हस्ताक्षर के बदले या पैसा चाहिए या फिर शाम की पार्टी से भी काम चल जाता है
अब सवाल ये उठता है की ऐसे सिस्टम के चलते गुनहगारों को कैसे सजा मिलेगी उनका बच के निकलना तय है सजा तो दूर की बात उन्हे सही सबक भी नही मिलता की कानून नाम की कोई पकड़ है जो उन्हे पकड़ पाने में तो कामयाब है लेकिन सजा दिला पाने में कानून की लचर व्यवस्था के कारण लाचार है जो न्याय के तराजू को सिर्फ एक ,,सिर्फ वाली प्रक्रिया में डाल कर न्याय हो गया घर जाए मस्त रहे वाली प्रक्रिया है.
अब देखना ये है की ये कानून व्यवस्था डिजिटल कानून व्यवस्था के आगे घुटने टेकती है या इसका भी कोई नया तोड़ निकाल पाने में कानून जानकर कामयाब हो जाते है.




