धमतरी…. कभी पशुपालन को गांवों में खेती का केवल सहायक माना जाता था—घर के लिए दूध, अंडा या कुछ अतिरिक्त आमदनी तक सीमित। लेकिन आज धमतरी जिले में पशुपालन सिर्फ सहायक गतिविधि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की रीढ़ बन चुका है। यह वह बदलाव है, जिसने ग्रामीण जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल दी हैं।
आज धमतरी के गांवों में खेतों के साथ-साथ गोठान, पशु शेड और पोल्ट्री फार्म किसानों की मेहनत और सपनों के प्रतीक बन चुके हैं। पशुपालन अब रोजगार, सम्मान और आर्थिक स्थिरता का मजबूत आधार बन रहा है।
जिले में पशुपालन को संगठित और उद्यम आधारित स्वरूप देने के लिए राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के अंतर्गत उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP) में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। बैकयार्ड पोल्ट्री एवं हैचरी, भेड़-बकरी पालन तथा पिगरी (सूकर पालन) जैसे क्षेत्रों में कुल 37 ऑनलाइन प्रकरण प्राप्त हुए, जिनमें से 28 प्रकरण स्वीकृत किए जा चुके हैं। भेड़-बकरी पालन के 28 प्रकरणों में से 24 प्रकरण SIA स्तर पर लंबित रहे, वहीं 15 प्रकरणों को बैंकों द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई है।
इन स्वीकृत प्रकरणों की कुल लागत लगभग 10 करोड़ रुपये है, जो यह दर्शाती है कि पशुपालन अब छोटे स्तर का कार्य नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता का सशक्त मॉडल बन चुका है। पशुपालन क्षेत्र में इतनी बड़ी राशि का ऋण स्वीकृत कराने वाला धमतरी जिला प्रदेश में अग्रणी बनकर उभरा है।
यह आंकड़े केवल फाइलों में दर्ज संख्याएं नहीं हैं, बल्कि गांव-गांव में उम्मीद की नई कहानियां लिख रहे हैं। कहीं कोई किसान आधुनिक डेयरी यूनिट स्थापित कर दुग्ध उत्पादन बढ़ा रहा है, तो कहीं महिलाओं का समूह बकरी पालन के जरिए आर्थिक रूप से सशक्त हो रहा है। ये प्रकरण व्यक्तिगत भी हैं और सामूहिक भी, लेकिन हर स्वीकृति ने ग्रामीण जीवन को नई दिशा दी है।
किसानों की सुविधा और आर्थिक संबल के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना भी प्रभावी रूप से गांवों तक पहुंचाई गई है। जिले में 1700 आवेदन तैयार किए गए, जिनमें से 180 किसानों को स्वीकृति मिल चुकी है। यह केवल ऋण नहीं, बल्कि किसान की मेहनत को पहचान और उसके सपनों को उड़ान देने का माध्यम है—चाहे वह फसल की तैयारी हो या पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था।
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत बैकयार्ड पोल्ट्री, भेड़-बकरी पालन और पिगरी जैसी गतिविधियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। कल्पना कीजिए—जिस किसान के पास कभी दो-तीन बकरियां थीं, आज वही किसान दर्जनों पशुओं के साथ न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है, बल्कि बाजार में अपनी अलग पहचान भी बना रहा है।
धमतरी जिले की यह पहल केवल आर्थिक सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक बदलाव की मिसाल भी है। महिलाएं अब आत्मनिर्भर समूहों के माध्यम से आगे बढ़ रही हैं, युवाओं को अपने ही गांव में रोजगार मिल रहा है और शहरों की ओर पलायन पर अंकुश लग रहा है।
कलेक्टर अबिनाश मिश्रा बताते है कि “धमतरी जिले में पशुपालन को केवल पारंपरिक गतिविधि न मानकर इसे रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने का सुनियोजित प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और बैंक ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।”
“बैंकों द्वारा लगभग 10 करोड़ रुपये के 15 प्रकरणों की स्वीकृति यह दर्शाती है कि अब किसान पशुपालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। यह जिले के लिए गर्व का विषय है कि पशुपालन क्षेत्र में इतनी बड़ी राशि का ऋण स्वीकृत कराने में धमतरी जिला प्रदेश में अग्रणी बन रहा है।”
कलेक्टर ने आगे बताया कि “पशुपालन के साथ किसान क्रेडिट कार्ड योजना को भी प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि किसानों को समय पर वित्तीय सहायता मिल सके। इससे किसानों की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और उनकी आय में स्थायी वृद्धि होगी।”
उन्होंने यह भी बताया कि “धमतरी जिले का लक्ष्य है कि पशुपालन को कृषि का मजबूत पूरक बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाया जाए। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी को बढ़ावा देकर गांवों में ही रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा रहे हैं।”
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि “शासकीय योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और किसानों की मेहनत से आने वाले समय में धमतरी जिला पशुपालन के क्षेत्र में प्रदेश के लिए एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित होगा।”
इस परिवर्तन के केंद्र में कलेक्टर के मार्गदर्शन, बैंक अधिकारियों की सक्रिय भूमिका और पंचायतों एवं समितियों के समन्वित प्रयास हैं। जब कोई किसान अपने पशु शेड से निकलते दूध के कनस्तरों को देखता है या कोई महिला समूह अपने पोल्ट्री फार्म में चूजों की चहचहाहट सुनता है—तो उनके चेहरे की मुस्कान ही इस योजना की असली सफलता है।
धमतरी जिले ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन सही दिशा में हो और उन्हें किसानों की मेहनत से जोड़ा जाए, तो गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं और किसान समृद्धि की नई गाथा लिख सकते हैं।



