कुरूद…. 8 फरवरी को कोया पूनेम गोंडी गाथा के तीसरे दिन प्रवाचक तिरू, शंकर शाह इरपाची ने कथा श्रवण के माध्यम से श्रोताओं को बताया काली कंकाली (कली कंकाली ) दाई गोंडवाना संस्कृति की एक प्रमुख आदिवासी शक्ति है जिन्हें 33 को (प्रकार )के बच्चों( देवताओं/ पेन) की माता के रूप में पूजा जाता है , माता ने रूप में पूजा जाता है । गोंडी धर्म के अनुसार 33 कोट के बच्चों को जन्म दिया और उन्हें पाल पोषकर बड़ा किया जो बाद में नील कोंडा पर्वत के रक्षक बने, लिंगो जांगों ने 33 को बच्चों को लेकर सोन नदी गया जो बालाघाट बिहार में स्थित है जिसे लांजीगढ़ कहते हैं नहलाने के बाद सेमर पेड़ ले गए उस समय स्कूल, बिल्डिंग, कॉलेज, नहीं थे हमारे गुरु भूमिका होते थे, उसे समय सेमर पेड़ के नीचे स्कूल लगते थे जिन्हें गोटूल बोलते हैं गोटुल का मतलब शिक्षा का केंद्र गोटुल शब्द से गुरुकुल बना दिया। अलाम और कलाम का जानकारी देते हुए बताया गौतम बुद्ध के गुरु थे गोंण्डी धर्म से बुद्ध धर्म का निर्माण हुआ है बुद्ध धर्म में भी छुआछूत भेदभाव नहीं चलता इस प्रकार गोंडी धर्म में भी छुआछूत भेदभाव नहीं चलता, क्योंकि हम प्रकृति को मानते हैं प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करता तालाब में नहाते समय तालाब बोलेगा क्या तू उच्च है नीचे है नहीं बोलता जो भेद करता है वह देवता या भगवान नहीं होता । एस सी,एसटी, ओबीसी तीनों का जहां भेदभाव छुआछूत नहीं होता, रयतार जंगो दाई ने महिलाओं के अधिकार के लिए क्रांतिकारी कदम उठाया जोआज आश्रम का निर्माण हुआ और उन्हें सशक्त बनाने में विशेष योगदान दिया वर्तमान में उसी का परिणाम है कि महिला और पुरुष आज कंधे से कंधे मिलाकर सामाजिक एवं हर क्षेत्र में योगदान दे रही है इस अवसर पर तारिणी चंद्राकर ,नीलम चंद्राकर ,सुरेंद्र ध्रुव राज ,युआर ध्रुव पुरुषोत्तम पड़ोटी , संतराम मरकाम, माखनलाल ध्रुव, हीरालाल पड़ोटी ,संतराम मरकाम ,माखनलाल ध्रुव , शैल्या नेताम ,श्रीमती बसंता ध्रुव, श्रीमती दुर्गा ध्रुव ,रोहित कुमार ध्रुव ,नीलकंठ ध्रुव ,कृष्ण कुमार ठाकुर ,तुलसीराम ठाकुर, संतोष सोरी, शशि प्रभा, मदनलाल मरकाम ,सहित सैकड़ो महिला पुरुष उपस्थित थे उक्त कार्यक्रम के आयोजन में समाज के लोगों का स्वागत सत्कार फलेद्र ध्रुव ने शुरू से अंत तक करते रहे।
कुरूद खेल मैदान में पांच दिवसीय पुनेम गोंडी गाथा का दूसरा दिन, जनसैलाब उमड़ा
कुरूद के खेल मैदान में आयोजित पांच दिवसीय पुनेम गोंडी गाथा कार्यक्रम का आज दूसरा दिन अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और जनभागीदारी के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम के प्रथम दिन देव व्यवस्था के साथ शुभारंभ किया गया था, वहीं दूसरे दिन कथा श्रवण हेतु बड़ी संख्या में जनसमुदाय उमड़ पड़ा।
गोंडी गाथा के कथा वाचक शंकर शाह हिरपाची ने गोंडवाना की उत्पत्ति,सरला-गाघरा के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व पर विस्तारपूर्वक कथा प्रस्तुत की। कथा के माध्यम से उन्होंने गोंडी धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, पूजा विधि, जन्म संस्कार, विवाह संस्कार एवं मृत्यु संस्कार पर समाजजन को जागरूक किया। कथा के दौरान जनसमुदाय भावविभोर होकर झूम उठा और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच इरपाची का भव्य स्वागत किया गया।
आज कथा वाचक की कथा सुनने के लिए दूर-दराज क्षेत्रों से आदिवासी समाज सहित अन्य समाज के लोग भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से जीवराखन मरई अध्यक्ष मां अंगार मोती ट्रस्ट, ललित ठाकुर तहसील अध्यक्ष,तेजराम छेदैहा, संतोष सोरी ,कार्यवाहक अध्यक्ष,शिवदयाल नेताम कोषाध्यक्ष, राधेश्याम मरई,उपाध्यक्ष, परदेसी राम मरकाम पाली अध्यक्ष,चमेली नेताम,राजकुमारी ध्रुव,हेमलता ठाकुर,बोधन छेदैया,रामायण लाल ध्रुव,हेमंत सोरी,जागेश्वर नेताम,खेलन सिंह ठाकुर,समाज के वरिष्ठ कुलंजन सिंह मंडावी सहित परिक्षेत्र,तहसील एवं जिला स्तर के पदाधिकारी लगातार उपस्थित रहकर कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु अपील कर रहे हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने में कुरूद ब्लॉक के वरिष्ठ पत्रकार बसंत ध्रुव का विशेष मार्गदर्शन एवं भूपेंद्र ध्रुव का सहयोग सराहनीय रहा,जिनके मार्गदर्शन में यह आयोजन सुचारू रूप से संचालित हो रहा है।
इस अवसर पर अध्यक्ष जीवराखन मरई ने समाजजन से आह्वान किया कि वे ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तन-मन-धन से सहयोग करें तथा गोंडी धर्म,संस्कृति, रीति-रिवाज और गोंडवाना की उत्पत्ति से जुड़ी बातों को अपने परिवार व आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि बच्चों को गोंडी गाथा जैसे कार्यक्रमों से जोड़ना आवश्यक है, ताकि हमारी संस्कृति, संस्कार, रीति-नीति और संविधानिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। कार्यक्रम के दौरान समाज के सभी सदस्यों से जिला स्तर पर सहयोग प्रदान करने की भी अपील की गई।




