धामतरी @ विश्वनाथ गुप्ता…. 2026 को लेकर बात करना भविष्यवाणी करना नहीं है, बल्कि वर्तमान को ध्यान से पढ़ना है। हर समाज कुछ संकेत छोड़ता है—बजट के आंकड़ों में, बाज़ार की चाल में, खबरों की भाषा में, और आम लोगों की बातचीत में। भारत भी ऐसा ही कर रहा है। 2026 इसलिए अहम नहीं कि वह कोई रहस्यमय साल है, बल्कि इसलिए कि तब तक आज के फैसलों, आदतों और चुप्पियों के नतीजे साफ दिखाई देने लगेंगे। यह साल किसी एक मोड़ का नाम नहीं, बल्कि कई रास्तों के एक साथ मिलने का बिंदु हो सकता है।
अगर शुरुआत वित्तीय हालात से करें, तो तस्वीर पूरी तरह अंधेरी भी नहीं है और पूरी तरह उजली भी नहीं। भारत की अर्थव्यवस्था आकार में बढ़ी है, लेकिन उसका बोझ बराबर नहीं बंटा। शेयर बाज़ार नई ऊँचाइयों को छू रहा है, पर घर का बजट रोज़ नई कसौटी पर खड़ा होता है। महंगाई कागज़ों में काबू में दिखती है, लेकिन रसोई में अक्सर बेलगाम लगती है। रोजगार के मौके बने हैं, पर उनकी स्थिरता पर सवाल है। 2026 तक अगर वैश्विक स्तर पर कोई बड़ा आर्थिक झटका आता है, तो भारत उससे पूरी तरह बचा रहेगा, यह कहना मुश्किल है। बड़े नाम टिके रहेंगे या बदलेंगे—यह बाज़ार तय करेगा—क्योंकि वो बड़े नाम जो आज तक अभेद्य किले के रूप में स्थापित थे, 2026 में ताश के पत्तों की तरह गिरते दिख सकते है जिनमें गूगल, मेटा फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट इत्यादि दर्जे की बड़ी वैश्विक आई.टी. कंपनियां विशेषकर शामिल हैं, लेकिन आम आदमी की चिंता यही रहेगी कि मेहनत का फल समय पर और पूरा मिले।
मीडिया की भूमिका सूचना देने से अधिक भावनाएं नियंत्रित करने की बन चुकी है। हर दिन एक नया लक्ष्य दिया जाता है—आज किससे नफरत करनी है, आज किससे डरना हैं, आज किस पर गुस्सा निकालना है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे व्यक्ति के भीतर क्रोध और घृणा को जमा करती जाती है। समस्या यह है कि जिस समुदाय या समूह के विरुद्ध यह ज़हर बोया जाता है, वह रोज़मर्रा के जीवन में सामने नहीं होता। परिणामस्वरूप यह संचित नफरत उन पर निकलती है जो सबसे पास होते हैं—घर के लोग, सड़क पर मिलने वाला कोई अजनबी, कोई कमज़ोर, कोई असहाय। एक छोटी से बहस आवेशात्मक हत्या का रूप ले लेती हैं, तो बलात्कार अब बलात्कार नहीं मानसिक विकृति से भरा एक कृत्य जिसमें अविश्वनीय निर्दयता और महिला की नृशंस हत्या भी शामिल हो जाती है। कुल जमा यह कि जिस गुस्से को एक दिशा दी गई थी, वह भटक कर समाज के भीतर ही विस्फोट करने लगता है।
इसमें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि आज बाल अपराध बढ़ रहे हैं, नशे की उम्र नीचे खिसक रही है, और यह सब अचानक नहीं हो रहा। बच्चों को वही परोसा जा रहा है, जो वे रोज़ देखते हैं—हिंसा, गाली, डर और असंवेदनशीलता। शिक्षा संस्थानों तक में यह घुस चुका है; स्मार्ट टी.वी. के नाम पर पढ़ाई नहीं, फिल्में चल रही हैं, और ऐसी फिल्में जिनमें मार-काट, बदले और आक्रोश को सामान्य दिखाया जाता है। नतीजा यह है कि बचपन खेल और जिज्ञासा से नहीं, बल्कि गुस्से और भ्रम से भर रहा है। अगर यही क्रम चलता रहा, तो आने वाला समय एक ऐसे समाज का होगा जहाँ अपराध उम्र नहीं देखेगा, और नशा अपवाद नहीं, आदत बन जाएगा।
महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षित रोजगार भारत की सामाजिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। बड़े व्यापारिक घरानों और आम नागरिक के बीच की खाई और चौड़ी हो रही है। यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा झटका आता है, तो भारत उससे अछूता नहीं रहेगा। 2026 तक कई प्रतिष्ठित व्यापारिक नाम डूब सकते हैं, और इसका सीधा असर रोज़गार व बाजार पर पड़ेगा। जब मेहनत का फल अनिश्चित हो जाता है, तब लोग व्यवस्था की वैधता पर सवाल उठाने लगते हैं। जब राज्य और बाजार दोनों नागरिकों को सुरक्षा देने में विफल प्रतीत होते हैं, तब समाज अपने समाधान खुद तलाशता है। ऐसे समय में ‘रॉबिनहुड’ जैसे चरित्र उभरते हैं—पहले छोटे स्तर पर, फिर संगठित रूप में। ये केवल अपराधी नहीं होते, बल्कि असंतोष की सामाजिक अभिव्यक्ति होते हैं। 2026 तक यदि असमानता और अन्याय बढ़ा, तो ऐसे प्रतीकात्मक नायक भारतीय समाज में दोबारा जगह बना सकते हैं। जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था उनसे दूर है, तो वे अपने-अपने तरीके से न्याय और संतुलन की कल्पना करने लगते हैं। कभी यह छोटे-छोटे प्रयासों में दिखता है, कभी ऐसे लोगों में जो व्यवस्था से सवाल करते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसे दौर में ‘नायक’ भी पैदा होते हैं—कुछ सच में बदलाव लाते हैं, कुछ सिर्फ कहानी बन जाते हैं। फर्क इस बात से पड़ता है कि समाज उन्हें कैसे देखता है।
तकनीक ने जीवन आसान भी किया है और जटिल भी। आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, डेटा और डिजिटल सिस्टम अब हमारे फैसलों के आसपास घूमने लगे हैं। बैंक से लेकर दफ्तर तक, सुविधा के साथ एक अनदेखा नियंत्रण भी आता है। समस्या तकनीक में नहीं, उसके इस्तेमाल में है। अगर नियम साफ हों, जवाबदेही हो, तो तकनीक सहायक बनती है; वरना वह दूरी पैदा करती है। 2026 तक यह सवाल और साफ होगा कि हम सिस्टम चला रहे हैं या सिस्टम हमें चला रहा है। शायद यहीं से तकनीक और इंसान के रिश्ते पर नई बातचीत शुरू होगी।
पर्यावरण का मुद्दा अब किताबों का विषय नहीं रहा। पानी की कमी, गर्मी का बढ़ता असर, और मौसम की अनिश्चितता रोज़मर्रा की चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं। शहर हो या गांव, सब किसी न किसी रूप में इसका असर महसूस कर रहे हैं। 2026 तक यह एहसास और गहरा हो सकता है कि प्रकृति के साथ समझौता नहीं, समझ बनानी होगी। यह डराने वाला नहीं, संभलने का संकेत है—क्योंकि अभी भी सुधार की गुंजाइश है। इसपर वैश्विक हालात भी भारत को प्रभावित करेंगे। दुनिया आज जितनी जुड़ी है, उतनी पहले कभी नहीं थी। इस ग्लोबल विलेज में किसी एक देश का तनाव, व्यापार, या संघर्ष बाकी सब तक पहुंचता है। ऐसे में भारत की असली ताकत उसकी अंदरूनी स्थिरता और आपसी भरोसा होगा। अगर भीतर संवाद बना रहा, तो बाहर के दबाव भी संभाले जा सकते हैं।
यहीं राजनीति का एक दिलचस्प लेकिन अनदेखा पहलू सामने आता है—आपूर्ति और मांग का सिद्धांत। अर्थशास्त्र की यह साधारण-सी बात राजनीति पर भी लागू होती है। मान लीजिए किसी ने बरसों तक रसगुल्ला नहीं खाया। जब मिलेगा, तो एक नहीं, दो नहीं, शायद चार खा लेगा। लेकिन यह भी तय है कि एक समय के बाद इच्छा खुद रुक जाती है। चाहे भूख हो, चाहे चाह—कोई भी चीज़ असीम नहीं होती। भारत की राजनीति में भी कुछ नाम, कुछ चेहरे, कुछ प्रतीक दशकों तक परोसे गए। एक समय था जब उनकी मांग थी, ज़रूरत थी। लेकिन हर चीज़ का एक चक्र होता है। जब आप किसी चीज़ को ज़रूरत से ज़्यादा परोस देते हैं, तो उसका स्वाद खत्म होने लगता है। 2026 तक विपक्ष की राजनीति इसी मोड़ पर खड़ी दिख सकती है—जहाँ पुराने प्रतीक अब वही ऊर्जा पैदा नहीं कर पा रहे, और एक नए नायक की ज़मीन खुद-ब-खुद तैयार हो रही है।
कुल मिलाकर, 2026 कोई डराने वाली तारीख नहीं है, बल्कि एक आईना है। वह दिखाएगा कि हमने पिछले सालों में क्या बोया है। यह साल टूटने और बनने—दोनों की संभावना लेकर आता है। दिशा अभी भी हमारे हाथ में है, बशर्ते हम थोड़ा ठहरकर सोचें, थोड़ा कम शोर करें, और थोड़ा ज्यादा सुनें।
मेरे विचार में यदि यह कलियुग था, तो यह धीरे-धीरे आपके आख़िरी आलिंगन में प्रवेश करेगा; और यदि यह कलियुग नहीं था, तो अब कलियुग को आप अपनी आँखों से देखेंगे।




