छठवें अखिल भारतीय किसान स्वराज सम्मेलन में सम्मानित हुए कश्यप, पद्मश्री डॉ. सुनीता नारायण ने भी उनके कार्यों की सराहना की
धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के एक किसान ने देशी धान की दुर्लभ किस्मों के संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय कार्यों से राष्ट्रीय स्तर पर जिले का गौरव बढ़ाया है। विकासखंड मगरलोड के ग्राम घोटियादादर निवासी कृषक नकछेड़ा राम कश्यप को कोलकाता में 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित छठवें अखिल भारतीय किसान स्वराज सम्मेलन में 350 देशी धान किस्मों के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस सम्मेलन में देश के 22 राज्यों के किसान एवं कृषि क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हुए।
श्री कश्यप का यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि धमतरी जिले की कृषि परंपरा, समृद्ध जैव विविधता और किसानों के पारंपरिक ज्ञान की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। उन्होंने वर्षों के प्रयास से देशी धान की 350 किस्मों को संरक्षित कर कृषि की अमूल्य विरासत को सहेजने का सराहनीय कार्य किया है। उनका प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए पारंपरिक बीज संपदा को सुरक्षित रखने के साथ जैव विविधता आधारित खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
सम्मेलन के दौरान पद्मश्री डॉ. सुनीता नारायण, निदेशक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट, नई दिल्ली ने धमतरी जिले के स्टॉल का अवलोकन किया। उन्होंने श्री कश्यप द्वारा संरक्षित देशी धान की किस्मों और उनके कार्यों की जानकारी ली तथा इस महत्वपूर्ण पहल की सराहना की। राष्ट्रीय स्तर के मंच पर धमतरी की पारंपरिक बीज संपदा और किसान के नवाचार को मिली यह पहचान जिले के लिए विशेष उपलब्धि है।
कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने कृषक नकछेड़ा राम कश्यप को इस उपलब्धि पर बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि देशी धान की 350 किस्मों का संरक्षण करना कृषि जैव विविधता और हमारी पारंपरिक विरासत को सहेजने का अनुकरणीय कार्य है। उन्होंने कहा कि श्री कश्यप ने अपने समर्पण और निरंतर प्रयासों से धमतरी जिले को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। ऐसे प्रगतिशील किसानों के अनुभव और प्रयास अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं। जिला प्रशासन जिले की कृषि परंपरा, स्थानीय बीजों के संरक्षण और नवाचार आधारित खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
श्री कश्यप की यह उपलब्धि बताती है कि किसानों का पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयास कृषि के भविष्य को अधिक टिकाऊ, समृद्ध और पर्यावरण अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।








