कुरूद। छत्तीसगढ़ में पशुपालन की परंपरा व्यावसायिक नहीं रही है। उपयोग के बाद पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं। सहकारी बैंक पशुपालकों के सहायता हेतु हमेशा तत्पर है। हमें दुग्ध उत्पादन को लाभकारी व्यवसाय बनाना होगा। स्वयं दूध निकालना सीखना होगा गांव को आर्थिक समृद्धि के रास्ते पर लाना है। गुजरात मॉडल को अपनाकर हमें दुग्ध सहकारिता को मजबूत करना होगा। यह सब जनता की जागरूकता एवं सक्रियता से ही शासन की कल्याणकारी योजनाएं सफल हो सकती है। उक्त विचार जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित रायपुर के अध्यक्ष निरंजन सिन्हा ने जिला स्तरीय प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियों का एकदिवसीय प्रशिक्षण सह कार्यशाला में व्यक्त किया।
यह कार्यशाला जिला सहकारी संघ धमतरी के द्वारा ग्राम पचपेड़ी के समरसता भवन में 9 सितंबर को आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य राज्य व केंद्र शासन की योजनाओं, दुग्ध उत्पादन हेतु उन्नत नस्ल के पशुओं का चुनाव, दुग्ध उत्पादन एवं पोषक आहार, शेड व दुधारू पशु हेतु सब्सिडी की जानकारी देकर पशुपालकों में जागरूकता लाना है। प्रशिक्षण कार्यशाला के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि निरंजन सिन्हा अध्यक्ष जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित रायपुर, कार्यक्रम के अध्यक्ष जनपद पंचायत कुरुद के उपाध्यक्ष सतीश जैन तथा विशिष्ट अतिथि रामगोपाल देवांगन पूर्व अध्यक्ष जनपद पंचायत कुरुद, डॉ टी आर वर्मा अतिरिक्त उपसंचालक पशु चिकित्सा सेवाएं धमतरी, पशुधन विभाग के डॉक्टर भूपेंद्र सिन्हा, डॉक्टर राकेश सिन्हा, डॉक्टर पीयूष दुबे, जिला संघ के प्रवक्ता डॉक्टर ए एन दीक्षित, प्राधिकृत अधिकारी सीपी साहू की गरिमामयी उपस्थिति में प्रारंभ हुआ।
इस अवसर पर डॉक्टर टी आर वर्मा ने कहा कि पशुपालन को व्यवसाय के स्तर पर अपनाए, उसे अपनी व्यावसायिक पूंजी मानकर उसके उन्नयन हेतु सदा प्रयत्नशील रहे। गांव में चारागाह की जमीन का संरक्षण करें श्रेष्ठ नस्ल के पशु ही रखे हैं। प्रत्येक पशुपालक को हरे चारे की खेती करनी होगी। बाजार से पशु आहार खरीद कर व्यवसाय को कभी लाभदायक नहीं बनाया जा सकेगा। हरा चारा दूध उत्पादन लागत घटाने हेतु आवश्यक है। पशुओं में विभिन्न पोषक तत्व कम होने से दूध उत्पादन में कमी होती है।
उन्होंने कहा कि समिति हर 11वें दिन किसानों को भुगतान करें। सर्वाधिक दूध देने वाला किसान ही समिति का सचिव होना चाहिए। डॉक्टर भूपेंद्र सिन्हा ने अपने उद्बोधन में कहा कि पशुपालन विभाग किसानों के हित में अनेक योजनाएं चला रहा है। इनका लाभ लेने के लिए उन्हें किसानों को सामने आना चाहिए। हमें श्रेष्ठ नस्ल के पशुपालन को बढ़ावा देना चाहिए। दुग्ध उत्पादन बढ़ाने हेतु पशुओं का आहार बहुत महत्वपूर्ण है।
डॉ दीक्षित ने अपने उद्बोधन में कहा कि सहकारिता को समाज में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले सदस्यों के सशक्तिकरण एवं उत्थान का भरोसेमंद माध्यम माना जाता है। यह वह व्यवसायिक संगठन है जो निर्धन और कमजोर उत्पादकों को संगठित कर उन्हें व्यवसाय का स्वामी बनाता है और उन्हें बाजार की शक्तियों का सामना करने में सक्षम भी बनाता है। यही कारण है कि हमारे देश की सरकार “सहकार से समृद्धि” अभियान के अंतर्गत देश भर में सहकारिता क्षेत्र को मजबूत और विकसित बनाने का निरंतर प्रयास कर रही है। परंपरागत रूप से दुग्ध उत्पादन को एक कच्चे व्यवसाय के रूप में पहचाना जाता था। इसका बाजार प्रायः संकीर्ण एवं स्थानीय होता था। शीघ्र नासवान वस्तु होने के कारण दुग्ध उत्पादक किसानों को अपना उत्पाद स्थानीय उपभोक्ताओं को औने पौने दामों पर बेचना पड़ता था, जिससे दुग्ध उत्पादन कोई लाभकारी व्यवसाय नहीं बन पाया था। आजादी के बाद कुछ वर्षों तक हमारे देश में दूध उत्पादन 17 से 20 मीट्रिक टन के बीच था। 1950-51 में प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 125 ग्राम थी, जो 2020-21 में बढ़कर 427 ग्राम हो गई है। आज हम इस दुग्ध उत्पादन में अग्रणी देश है और प्रतिवर्ष 220 मीट्रिक टन दूध का उत्पादन कर अब हम दूध के निर्यातक बन गए हैं, जबकि 1970 तक हमें दूध आयात करना पड़ता था। इस श्वेत क्रांति में दुग्ध सहकारी समितियों का अमूल्य योगदान है। सन् 1946 में आनंद में स्थापित अमूल ने डेयरी सहकारिता को एक नया आयाम दिया। सन् 1949 में वर्गीज कुरियन ने अमूल को श्वेत क्रांति का अगवा बना दिया, उनके सम्मान में प्रतिवर्ष 26 नवंबर को मिल्क डे मनाया जाता है। आज लगभग प्रत्येक राज्य में अमूल की तर्ज पर दुग्ध समितियां संचालित है। प्रतिदिन 1.6 करोड़ किसानों से 30 मिलियन लीटर दूध संग्रहित किया जाता है। निश्चित कीमत प्राप्त होने के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।
धमतरी जिले में कार्यरत 63 दुग्ध समितियों में 30,000 किसान जुड़े हैं, जिनसे प्रतिदिन 10000 लीटर दूध संग्रहित किया जाता है। किसानों को भुगतान में सुविधा हेतु समितियों में माइक्रो एटीएम भी स्थापित किए गए हैं। सहकारी समितियों के माध्यम से दुग्ध उत्पादक कृषिकों को प्रेरित कर आगामी 25 वर्षों में दुग्ध उत्पादन 628 मिलियन मीट्रिक टन विश्व उत्पादन में 45% का योगदान करने का लक्ष्य है। उस समय हम 110 मिलियन मीट्रिक टन दूध का निर्यात कर रहे होंगे। कार्यक्रम को मंचस्थ अतिथियों ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जिले के पशुपालक व समिति के पदाधिकारी गण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन जिला सहकारी संघ के प्रबंधक ए पी गुप्ता ने किया।










