बब्रुवाहन से ब्रह्मास्त्र तक के सिनेमाई सफर का साक्षी रहा रिट्ज, यहीं लगी थी पहली बोलती फिल्म

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फिलवक्त सिनेमा हॉल का रुख करने से पहले दर्शक मुतमइन हो लेना चाहता है कि वह जिस फिल्म पर पैसा व समय खर्च करने जा रहा है, वह उसे कतई बोर न करे। दर्शक फिल्म को रिव्यू समेत दूसरे मापदंडों पर परखता है। यही वजह है कि अब महीनों तक टॉकीज में फिल्में नहीं चल पातीं, जबकि एक दौर वह भी था, जब सालभर में दो से तीन फिल्में ही लगा करती थीं। कश्मीरी गेट स्थित रिट्ज सिनेमा हॉल के ऑफिस में लगी फिल्मों की सिल्वर जुबली की ट्रॉफियां मूक फिल्मों से आधुनिक सिनेमाई जगत तक के शानदार सफर की  गवाही देती हैं।

सिनेमा दिवस के मौके पर बात दिल्ली में 100 साल पूरी कर रही रिट्स टॉकीज की हो रही है। बब्रुवाहन, सती सावित्री, बुद्ध देव जैसी मूक फिल्मों से शुरू हुआ इस टॉकीज का सफर आज वीएफएक्स से लैस ब्रह्मास्त्र तक पहुंच गया है। 100 वर्षों में इसकी दीवारों ने तालियों की गड़गड़ाहट से लेकर खाली पड़ीं सीटों की मायूसी तक को महसूस किया है। 1923 में कश्मीरी गेट पर खुली इस टॉकीज में जब देश की पहली बोलती फिल्म आलमआरा लगी, तो भारतीय सिनेमा की इस उपलब्धि का हिस्सा बनने के लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा। 1932 की इस फिल्म का टिकट मिलने पर दर्शक की लॉटरी सी लग जाती थी।

पहले इसका नाम कैपिटल टॉकीज था। बाद में जब मौजूदा संचालक विजय नारायण सेठ के पिता जगत नारायण सेठ ने 1940 में कारोबार संभाला तो नाम बदलकर रिट्ज सिनेमा रख दिया। उन्होंने उसी दौर में पेशावर, लाहौर और शिमला में भी रिट्ज की चेन खोली। शमी कपूर और शायरा बानो की फिल्म जंगली रिट्ज में सबसे अधिक समय 40 हफ्ते तक चलने वाली फिल्म है। बताते हैं कि जब याहू…कोई मुझे जंगली कहे… गाना बजता था तो हॉल में मौजूद हर कोई नाचने लगता था। प्रेम रोग, हमराज, नूरी, कालिया, प्यार झुकता नहीं, नसीब जैसी कई फिल्मों ने हॉल में अपनी सिल्वर जुबली पूरी की।

जब डाकुओं ने पूरा हॉल बुक किया
विजय नारायण सेठ बताते हैं कि 1963 में उनके जगत सिनेमा हॉल में सुनील दत्त की फिल्म ‘’मुझे जीने दो’’ रिलीज हुई तो एक दिन एक आदमी ने पूरा हॉल बुक कर लिया। उसके जाने के बाद पता चला कि ये डाकू है। यह सुनकर पूरा स्टाफ भाग गया। रात में करीब सौ से अधिक डाकू पहुंचे। डर से मशीन चलाने वाला आदमी अपने केबिन से नहीं निकला। डाकुओं के जाने के बाद सब की जान में जान आई। पुराने दिनों को याद करते हुए विजय कहते हैं कि जब ‘’जय मां संतोषी’’ फिल्म लगी तो लोग चप्पल हॉल के बाहर उतारकर आते थे।

 महिलाओं के लिए बनाए थे अलग बॉक्स
हॉल में अभी दर्शकों के लिए 576 सीटें हैं। हालांकि पहले की तरह पूरी सीटें भर जाएं ऐसा अब न के बराबर होता है। विजय बताते हैं कि रिट्ज में महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनजर अलग से बॉक्स दिए जाते थे। इस कारण महिलाएं यहां खुद को ज्यादा महफूज महसूस करती थीं। ये बॉक्स आज भी हैं लेकिन अब इन्हें प्रेमी जोड़े ज्यादा लेते हैं। यह एकमात्र सिनेमा हॉल था, जिसमें बिलियर्ड और बार था।

10 आने से 165 रुपये तक का टिकट
विजय नारायण सेठ बताते हैं कि जब हॉल खुला तो टिकट का न्यूनतम मूल्य 10 आने था। बॉक्स के लिए महिलाओं को एक रुपये से अधिक खर्च करना पड़ता था। आज यहां टिकट की कीमत 120 रुपये से लेकर 165 रुपये तक है, जो अन्य के मुकाबले काफी कम है।

अंग्रेजों से खरीदा था सिनेमा हॉल
रिट्ज के अलावा उनके जगत और नॉवल्टी नाम से भी दो सिनेमा हॉल चलते थे, जोकि बाद में बंद हो गए। नॉवल्टी का पहले नाम एलफिंस्टन था और यह ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी का था, जिसे विजय के पिता ने 1934 में खरीदा और इसका नाम बदलकर नॉवल्टी रखा। हॉल में ‘’शोले’’ पौने दो साल तक चली थी।

2004 में बंद भी हुआ
2004 में किन्हीं कारणों के चलते हॉल बंद हुआ, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव के कारण परिवार के लोगों ने इसे दोबारा खोलने का निर्णय लिया। 2009 में नवीनीकरण कर हॉल को दोबारा दर्शकों के लिए खोला गया। वर्तमान में विजय नारायण सेठ, अपने भाई वीरेंद्र नारायण सेठ और बेटों रोहित, वरुण और विधुर के साथ इसका संचालन करते हैं।

कुछ रोचक तथ्य

  • 1500 से 1800 फिल्में हर साल रिलीज होती हैं भारत में
  • 6000 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थियेटर हैं भारत में
  • भारत में बनती हैं सबसे ज्यादा फिल्में

विस्तार

फिलवक्त सिनेमा हॉल का रुख करने से पहले दर्शक मुतमइन हो लेना चाहता है कि वह जिस फिल्म पर पैसा व समय खर्च करने जा रहा है, वह उसे कतई बोर न करे। दर्शक फिल्म को रिव्यू समेत दूसरे मापदंडों पर परखता है। यही वजह है कि अब महीनों तक टॉकीज में फिल्में नहीं चल पातीं, जबकि एक दौर वह भी था, जब सालभर में दो से तीन फिल्में ही लगा करती थीं। कश्मीरी गेट स्थित रिट्ज सिनेमा हॉल के ऑफिस में लगी फिल्मों की सिल्वर जुबली की ट्रॉफियां मूक फिल्मों से आधुनिक सिनेमाई जगत तक के शानदार सफर की  गवाही देती हैं।

सिनेमा दिवस के मौके पर बात दिल्ली में 100 साल पूरी कर रही रिट्स टॉकीज की हो रही है। बब्रुवाहन, सती सावित्री, बुद्ध देव जैसी मूक फिल्मों से शुरू हुआ इस टॉकीज का सफर आज वीएफएक्स से लैस ब्रह्मास्त्र तक पहुंच गया है। 100 वर्षों में इसकी दीवारों ने तालियों की गड़गड़ाहट से लेकर खाली पड़ीं सीटों की मायूसी तक को महसूस किया है। 1923 में कश्मीरी गेट पर खुली इस टॉकीज में जब देश की पहली बोलती फिल्म आलमआरा लगी, तो भारतीय सिनेमा की इस उपलब्धि का हिस्सा बनने के लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा। 1932 की इस फिल्म का टिकट मिलने पर दर्शक की लॉटरी सी लग जाती थी।

पहले इसका नाम कैपिटल टॉकीज था। बाद में जब मौजूदा संचालक विजय नारायण सेठ के पिता जगत नारायण सेठ ने 1940 में कारोबार संभाला तो नाम बदलकर रिट्ज सिनेमा रख दिया। उन्होंने उसी दौर में पेशावर, लाहौर और शिमला में भी रिट्ज की चेन खोली। शमी कपूर और शायरा बानो की फिल्म जंगली रिट्ज में सबसे अधिक समय 40 हफ्ते तक चलने वाली फिल्म है। बताते हैं कि जब याहू…कोई मुझे जंगली कहे… गाना बजता था तो हॉल में मौजूद हर कोई नाचने लगता था। प्रेम रोग, हमराज, नूरी, कालिया, प्यार झुकता नहीं, नसीब जैसी कई फिल्मों ने हॉल में अपनी सिल्वर जुबली पूरी की।

जब डाकुओं ने पूरा हॉल बुक किया

विजय नारायण सेठ बताते हैं कि 1963 में उनके जगत सिनेमा हॉल में सुनील दत्त की फिल्म ‘’मुझे जीने दो’’ रिलीज हुई तो एक दिन एक आदमी ने पूरा हॉल बुक कर लिया। उसके जाने के बाद पता चला कि ये डाकू है। यह सुनकर पूरा स्टाफ भाग गया। रात में करीब सौ से अधिक डाकू पहुंचे। डर से मशीन चलाने वाला आदमी अपने केबिन से नहीं निकला। डाकुओं के जाने के बाद सब की जान में जान आई। पुराने दिनों को याद करते हुए विजय कहते हैं कि जब ‘’जय मां संतोषी’’ फिल्म लगी तो लोग चप्पल हॉल के बाहर उतारकर आते थे।

 महिलाओं के लिए बनाए थे अलग बॉक्स

हॉल में अभी दर्शकों के लिए 576 सीटें हैं। हालांकि पहले की तरह पूरी सीटें भर जाएं ऐसा अब न के बराबर होता है। विजय बताते हैं कि रिट्ज में महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनजर अलग से बॉक्स दिए जाते थे। इस कारण महिलाएं यहां खुद को ज्यादा महफूज महसूस करती थीं। ये बॉक्स आज भी हैं लेकिन अब इन्हें प्रेमी जोड़े ज्यादा लेते हैं। यह एकमात्र सिनेमा हॉल था, जिसमें बिलियर्ड और बार था।

10 आने से 165 रुपये तक का टिकट

विजय नारायण सेठ बताते हैं कि जब हॉल खुला तो टिकट का न्यूनतम मूल्य 10 आने था। बॉक्स के लिए महिलाओं को एक रुपये से अधिक खर्च करना पड़ता था। आज यहां टिकट की कीमत 120 रुपये से लेकर 165 रुपये तक है, जो अन्य के मुकाबले काफी कम है।

अंग्रेजों से खरीदा था सिनेमा हॉल

रिट्ज के अलावा उनके जगत और नॉवल्टी नाम से भी दो सिनेमा हॉल चलते थे, जोकि बाद में बंद हो गए। नॉवल्टी का पहले नाम एलफिंस्टन था और यह ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी का था, जिसे विजय के पिता ने 1934 में खरीदा और इसका नाम बदलकर नॉवल्टी रखा। हॉल में ‘’शोले’’ पौने दो साल तक चली थी।

2004 में बंद भी हुआ

2004 में किन्हीं कारणों के चलते हॉल बंद हुआ, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव के कारण परिवार के लोगों ने इसे दोबारा खोलने का निर्णय लिया। 2009 में नवीनीकरण कर हॉल को दोबारा दर्शकों के लिए खोला गया। वर्तमान में विजय नारायण सेठ, अपने भाई वीरेंद्र नारायण सेठ और बेटों रोहित, वरुण और विधुर के साथ इसका संचालन करते हैं।

कुछ रोचक तथ्य

  • 1500 से 1800 फिल्में हर साल रिलीज होती हैं भारत में
  • 6000 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थियेटर हैं भारत में
  • भारत में बनती हैं सबसे ज्यादा फिल्में

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