चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में विविधता

-डॉ. लूनेश कुमार वर्मा (व्याख्याता)
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय छछानपैरी
विकास खंड-अभनपुर, जिला रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो. 8109249517luneshverma@gmail.com

सारांश- गीत कविता की लोकप्रिय और पुरानी विधा है। इसमें स्वर एवं लय आपस में आबद्ध शब्द होते हैं। बोल, छंद, मुखड़ा, लय गीत के घटक होते हैं। मन के किसी कोने को जब कोई भाव छू लेता है, तब गीत के बोल स्वत: झंकृत होने लगता है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसे अनेक अवसर होते हैं, जिनमें विविध तरह के गीत और मंगलाचार गाए जाते हैं। खुशी और मार्मिक अभिव्यक्तियों में गीतों का विविध रूप देखने को मिलता है। लोरी गीत बहुत मधुर होता है। गीत के बोल केवल मानव वाणी ही नहीं है, अपितु समूची प्रकृति में, सागर की लहरों में, वर्षा की बूँदों में, नदियों की धाराओं में, झर-झर झरते झरनों में, सूर्य की किरणों में, सर-सर सरसराती पवन के झोंकों में गीत की सत्ता सदैव अनादि और अमर है। गीतों में संस्कृति, क्षेत्रीयता, स्थानीयता, भाषा, बोली, रहन-सहन, पूजा के अवसर आदि में अनेक प्रकार के भाव मिलते हैं।
मुख्य शब्द- गीत, स्वर, लय, भाव, झंकृत, खुशी और मार्मिक अभिव्यक्ति।
गीत कविता की लोकप्रिय विधा है। गीतों की परंपरा बहुत पुरानी है। लोक में निहित गीतों की अविरल परंपरा इसका साक्षात प्रमाण है। गीत-संगीत का जन्म वैदिक काल से माना जाता है। सामवेद पूरी तरह से संगीत बद्ध है। सामवेद की ऋचाओं के गान को साम गान कहा जाता है। ऐसी रचना जिसमें स्वर एवं लय आपस में आबद्ध शब्द होते हैं गीत कहलाते हैं।
गीत छोटी कविता का एक रूप होता है, जिसे संगीत के साथ पिरोकर गायन किया जाता है। बोल, छंद, मुखड़ा, लय ये गीत के अलग-अलग घटक होते हैं। इसका उद्देश्य विभिन्न भावनाओं को मनोरंजन के साथ अभिव्यक्त करना होता है। “गीत एक विधा है, और समसामयिक परिवर्तन के साथ चिरंतन विधा है।”1 गीतों के माध्यम से मानव मन के विविध संवेग अलग-अलग रूप में अभिव्यक्ति पाते हैं। मन के किसी कोने को जब कोई भाव छू लेता है, तब गीत के बोल स्वत: झंकृत होने लगता है। यह पूरी तरह से आत्म केंद्रित होता है।
प्रत्येक व्यक्ति के सुख-दुख, राग-विराग में समय के साथ जटिलताओं का समावेश सहज और स्वाभाविक होता है। यह समय सापेक्ष होता है। समयानुसार इनमें परिवर्तन होते रहता है। “आज की संवेदना आदिकालीन, मध्ययुगीन और आधुनिक काल के रूमानी गीतों की संवेदना की तरह एक लय में वेग से फूट नहीं चलती, बल्कि वह एक विशिष्ट मानसिक स्थिति में अपने अनुकूल बिखरे हुए संवेग से जुड़ती है, अर्थात एक संवेग दूसरे से संक्रांत होता है। ये संक्रांत संवेग एक आंतरिक एकता से अनुशासित होते हैं।”2 जीवन के विविध रूपों का दर्शन गीतों में मिलता है।
व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसे अनेक अवसर होते हैं, जिनमें विविध तरह के गीत और मंगलाचार गाए जाते हैं। खुशी और मार्मिक अभिव्यक्तियों में गीतों का विविध रूप देखने को मिलता है। गीतों में संस्कृति, क्षेत्रीयता, स्थानीयता, भाषा, बोली, रहन-सहन, पूजा के अवसर आदि में अनेक प्रकार के संवादात्मक भाव मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में विविधता है। गीतों में विभिन्न भावनाओं को अक्षरों और शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया जाता है। गीतों के विषय में वे कहते हैं-
किसम-किसम के बात हे
आखर-आखर मुलाकात हे
गीत संझा, गीत बिहनिया
गीत ले दिन रात हे।3
व्यक्ति का जब जन्म होता है, तब उसे पहले-पहल उसे माँ, दादी, नानी की लोरी सुनने को मिलती है। लोरी गीत बहुत मधुर होता है। लोरी वह गीत होता है, जिसको सुनते-सुनते नवजात शिशु नींद के आगोश में सरलता से चला जाता है। कुछ शिशु ऐसे होते हैं, जब तक उन्हें लोरी गीत सुनने को न मिले वह सोने के लिए तैयार नहीं होते हैं। लोरी गीत का महत्व बताते हुए हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं-
‘गीत चेतना के सिर कलंगी
गीत खुशी के मुख पर सेहरा
गीत विजय की कीर्ति पताका
गीत नींद गफलत पर पहरा।4
लोरी गीत गाने और सुनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस गीत को जितने प्रेम से माँ, दादी, नानी सुनाती है, संभवत: कोई दूसरा गीत नहीं। इस गीत में वात्सल्य का अनुपम समाहन होता है। लोरी गीत केवल शिशु के लिए ही नहीं होता है, अपितु लोरी गीत के कारण संपूर्ण घर परिवार में आनंद का वातावरण निर्मित हो जाता है। चंपेश्वर गोस्वामी लिखते हैं-
झूलना मं झूलय बेटी रानी
झूलत हे बेटी रानी हो
मुच-मुच सुग्घर बेटी मुसकावय
हिरदे ला पुलकावय हो
देखव घर भर आनंद मनावय।5
गीत के बोल केवल मानव वाणी ही नहीं है, अपितु समूची प्रकृति में गीत के स्वर सदियों से गूंज रहे हैं। सागर की लहरों में गीत है। वर्षा की बूँदों में गीत है। नदियों की धाराओं में गीत है। झर-झर झरते झरनों में गीत है। सूर्य की किरणों में गीत है। सर-सर सरसराती पवन के झोंकों में गीत है। इस तरह गीतों की सत्ता सदैव अनादि और अमर है।
सागर नदिया बन मं स्वर हे
सात सुर सात रंग मं स्वर हे
जीवन मरण सब ढंग मं स्वर हे
सब मरथे फेर स्वर अमर हे।6
आज समाज में चहुंओर शोषण का बोलबाला है। अमीर गरीब का खून चूस-चूसकर और अमीर होते जा रहे हैं। भारत में लंबे समय तक अंग्रेजों का शासन रहा है। भारत से कच्चा माल लेना और उसे पक्का माल बनाकर ऊँचे दामों में बेचना उनकी नीति रही है। स्वतंत्रता पश्चात भी विभिन्न उद्योगपति हमसे सस्ते दामों पर कच्चा माल लेकर विभिन्न वस्तुएँ बनाकर ऊँचे दामों पर हमें ही बेचते हैं। हम ठगे से देखते रह जाते हैं। छत्तीसगढ़ में लोहा, कोयला जैसे अयस्क प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हैं। खदानों से निरंतर खनन चल रहा है, फिर भी मंहगाई अपने चरम पर है। इन्हीं स्थितियों को गीत में पिरोकर चंपेश्वर गोस्वामी लिखते हैं-
अपन तिजौरी ला भरत हे संगी
हमर पूंजी ला लुटावत हे संगी
हीरा हमर, लोहा हमर
तबले हमला कंगाल काहत हे।7
जब किसी के हृदय में प्रेम भाव होता है, तब वह अनायास ही गीत संगीत की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए कहा जाता है- हर दिल जो प्यार करेगा, वह गाना गाएगा। यह गीत-संगीत व्यक्ति की मातृभाषा में सहज ही उत्पन्न होता है। यदि कोई व्यक्ति छत्तीसगढ़ का है, वह छत्तीसगढ़ी संस्कृति में पला-बढ़ा है, तब निश्चित रूप से उसके हृदय में जो भाव उत्पन्न होंगे वे स्थानीय बोली छत्तीसगढ़ी में ही होगी। चंपेश्वर गोस्वामी कहते हैं-
मया पीरीत मनमीत हे सुग्घर
हिरदे मं संगीत हे सुग्घर
भाव प्रभाव के भाखा हमर
छत्तीसगढ़ी मीठ हे सुग्घर।8
प्राचीन समय में जो घुमंतू जाति हुआ करती थी, उनका कोई पता-ठिकाना नहीं हुआ करता था। ऐसे ही आज समाज में अनेक ऐसे वर्ग हैं, जिनका पता-ठिकाना निश्चित नहीं रहता है। वे किस समय कहाँ रहेंगे, वे स्वयं नहीं कह सकते हैं। ऐसे ही समाज में एक वर्ग है- ट्रक चालकों का। इनका जीवन-बसर ट्रक में ही होता है। इनका ट्रक किस समय कहाँ होगा, इन्हें स्वयं पता नहीं होता है। इनका जीवन दुनिया में यहाँ-वहाँ आते-जाते रहने में ही व्यतीत हो जाता है। इसी में ये आनंद लेने लग जाते हैं। इन्हीं भावों को गीतों में पिरोकर चंपेश्वर गोस्वामी लिखते हैं-
झन पूछ पता हमर
रहिथन गा जगर-कतर
दिन रात घूमत रहिथन
गली गांव साहर-साहर
हमर तो संगी इही ये
टरक मं रहई टरक मं खवई
टरक मं सुतई टरक मं उठई
दुनिया किंजरई
संगी रोजे मंड़ई
वही दे अरम पपई।9
आज समाज में लोग पढ़-लिखकर रोजगार की तलाश में गाँव-घर छोड़ कर अन्यत्र चले जाते हैं। माता-पिता जीवन भर अपने बच्चों को देखते रहते हैं। उनका पैतृक भू से लगाव गहरा होता है। फलत: वे वृद्ध अकेले रह जाते हैं। वहीं रहकर प्रवासियों की भांति प्रतीक्षा करते रहते हैं। देखते-देखते उनकी आँखों का पानी सूख जाता है। पत्र लिखने पर उत्तर नहीं मिलता है। संतानों से वियोग जनित दुःख के कारण उनके देह की स्याही सूख जाती है। संसार में माया की गजब महिमा है। संतान परदेश जा वृद्ध माता-पिता को भूल से जाते हैं और वृद्ध माता-पिता की विपरीत स्थिति होती है। उन्हें संतति सुख के अतिरिक्त कुछ सूझता नहीं है। उनकी इस स्थिति को देख हँसी उड़ाते हैं। चंपेश्वर गोस्वामी कहते हैं-
आंखी पतरागे
सूना कोठी हा भागे
अब तब छूटत हे सांस
मोला अइसन लागे
लिखंव कइसे पाती
सूखागे तन सियाही
तोर बिन भावय नहीं
का कहंव कुछु कहीं
हांसत हे जग हा
जिनगी ल मोर संवार।10
प्रकृति और मानव जीवन एक दूसरे के पूरक हैं। मानव जीवन का विकास प्रकृति की गोद में ही होता है। प्रकृति को संरक्षित करने में मनुष्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। चंपेश्वर गोस्वामी प्रकृति को माना जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। वे प्रकृति को अपने संगी-साथी के तौर पर देखते हैं। उन्होंने नदी, झरने, पहाड़, जंगल, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए इन्हें अपने जीवन के संगी-साथी बनाने की बात करते हैं। वे कहते हैं-
नदिया झरना परबत जंगल
मन ल मोहत हावय जी
बढ़व चलव आगू बढ़व
सबला काहत हावय जी
चिरइ चिरगुन के अमरीत बानी
सुनके हम मया म बंधावन
झूमत नाचन धेम मचावन
पेड़ ल संगी बनावन।11
समय सदा एक सा नहीं होता है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख होता है। यही प्रकृति का नियम है। यदि आज कोई सुखी या दुखी है, तो वह सदा वैसा नहीं रहेगा। समय चक्रवत घूमता है। इस सत्य को जान कर कोई दुखी व्यक्ति अपने दु:ख को कमतर अनुभव करता है और सुखी व्यक्ति अहंकार से बचने का प्रयास करता है। चंपेश्वर गोस्वामी कहते हैं-
दिन हमरो बहुरही संगी
झन कर चिंता फिकर
घुरुवा के दिन बहुरथे
बहुरही हमरो दिन
झन कर चिंता फिकर।12
इक्कीसवीं सदी में समाज में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। पश्चिमी संस्कृति का अंधा अनुकरण कर रहे हैं। चाहे बात खान-पान की हो या वेशभूषा की। लोग अपनी पहचान भूला नित नए-नए फैशन अपना रहे हैं। वृद्धों में भी किशोरों जैसे दिखने की प्रवृत्ति पनप रही है। आज किसी के कपड़ों को देखकर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि वह भारतीय है या अन्य। छोटे-बड़े सभी बिना सोचे-समझे अपनी संस्कृति को भूल पश्चिमी संस्कृति के प्रति लालायित जान पड़ रहे हैं। इन सबके फलस्वरूप समाज में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। चंपेश्वर गोस्वामी लिखते हैं-
डोकरी-डोकरा मन
सोला सतरा के दिखथे
भुला के टूरा उत्ती के गोठ ल
बुड़ती के पुजेरी होगे जी।13
निष्कर्ष- गीतों में तरह-तरह की बातें होती हैं, भावनाएँ होती हैं। विभिन्न भावनाओं को अक्षरों और शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया जाता है। इनमें कुछ निरर्थक शब्दों का भी प्रयोग कुशलता से किया जाता है। गीतों में मधुरता होती है, गेयता होती है। इसलिए गीतों को सुबह से लेकर शाम तक दिन से लेकर रात तक अर्थात चौबीसों घंटे गीतों को गाया जाता है। गीतों में क्षेत्रीयता के कारण विशिष्टता का समावेश हो जाता है।
संदर्भ-
नगेंद्र एवं हरदयाल. हिंदी साहित्य का इतिहास. इंदिरापुरम : मयूर पेपरबैक्स, संस्करण : 2015, पृष्ठ 628.
वही पृष्ठ 628.
गोस्वामी, चंपेश्वर. गीत के गाड़ी. रायपुर : वैभव प्रकाशन, संस्करण : 2018, पृष्ठ 15.
कौशिक, माधव. नवगीत की विकास यात्रा. पंचकूला : हरियाणा साहित्य अकादमी, संस्करण : 2007, पृष्ठ 02.

गोस्वामी, चंपेश्वर. गीत के गाड़ी. रायपुर : वैभव प्रकाशन, संस्करण : 2018, पृष्ठ 22.
वही पृष्ठ 27.
वही पृष्ठ 31.
वही पृष्ठ 38.
वही पृष्ठ 85.
वही पृष्ठ 92
गोस्वामी, चंपेश्वर. चन्दन अस मोर गाँव के माटी. रायपुर : आशु प्रकाशन, संस्करण : 2020, पृष्ठ 15.
वही पृष्ठ 77.
वही पृष्ठ 132

प्रमाण पत्र
प्रमाण पत्र प्रमाणित किया जाता है कि “चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में विविधता” यह शोध आलेख पूर्णत: मौलिक है, साथ ही इसे किसी अन्य स्थान पर प्रकाशनार्थ भेजा नहीं गया है।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा (व्याख्याता)
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Hamar Dhamtari
Author: Hamar Dhamtari

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